🤔
"अच्छा! अब समझी!"
यह कहकर मैंने ख़ुद को समझा दिया -
कि मैंने उसकी बात को समझ लिया -
क्या वाकई?
हो भी सकता है और नहीं भी
हर इंसान अपनी समझ के अनुसार ही दूसरे को समझ पाता है -
या अपनी नासमझी से नहीं या कुछ और समझ जाता है!
अब सवाल ज़हन में आया कि क्या हम ख़ुद को समझ पाते हैं?
तो इसका जवाब भी सिक्के के दो पहलू की तरह ही -
कुछ हद तक हाँ है,
और कुछ हद तक नहीं।
कुछ सही ग़लत नहीं होता -
सब अपनी समझ के अनुसार सही या ग़लत होते हैं।
तो जब धीरे - धीरे हमारी समझ का दायरा बढ़ता है,
तो हमारी सहनशीलता भी बढ़ती है -
और हम सबको -
जो जैसा है, वैसे ही स्वीकार लेते हैं।
बस समझ - समझ की बात है
जो समझ गए, तो समझदार -
और जो ना समझे - वो भी कुछ तो समझे ही।
बस इतनी सी बात है!
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