वह घर हममें बसता है।
ईंट, पत्थर, बालू से रचा घर -
खून, पसीने, प्यार की बुनियाद से पनपता है।
घर एक स्थान से बढ़कर,
एक भावना है -
एक खुशहाल, सुरक्षित भावना।
घर में रहकर भी लोग घर ढूंढते हुए उम्र गुज़ार देते हैं
या घर से दूर रहकर भी घर सा सुकून महसूस कर पाते हैं।
घर बनाने में उम्र लग जाती है और मिटाने में कुछ क्षण।
कुछ लोग घर में रहकर भी घर जैसे नहीं लगते,
तो कुछ कहीं भी रहकर भी घर से लगते हैं।
कई बार घर बनाने के लिए घर छोड़ना बहुत ज़रूरी होता है,
और घर की अहमियत समझने के लिए भी।
कभी पूरा धरातल ही हमारा घर लगता है,
तो कभी घर होना भी एक सपना सा लगता है।
हर घर अपनी कहानी संजोता है,
घर वो सुकून है जो हम सबसे, हम सबमें बसता है।

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