Monday, August 28, 2023

समता


मन मेरा फिर घबराया -
अश्रुधारा बन बरस आया,
मन को मैने लाख समझाया 
पर हठीला मन कहाँ समझ पाया?
' जीवन ज़िंदादिली का नाम है
जीवन से ज़िंदादिली - ज़िंदादिली से जीवन।'
कुछ क्षण समझा,
फिर बरस पड़ा!
मैने फिर उसे समझाया 
इस बार वह समझ गया।
कुछ क्षण सही - समता को पा गया -
वही समता जो योग है -
जीवन का उद्देश्य है;
उतार चढ़ाव के मनोवेग में -
कभी उदासी कभी उल्लास में
जो तुम कुछ ठहरना सीख गए,
हर हाल में बहना सीख गए -
कि कल जैसा भी था,
कि कल जैसा भी हो!
इस क्षण में बसा है रहस्य -
क्षण भर जी लो मनुष्य!
क्षण ही जीवन का परमाणु,
क्षण दर क्षण जो जी गए,
जीवन को भरपूर पी गए;
बाधाओं के जंजाल में -
उलझ कर फिर सुलझ गए,
और खुशियों के मायाजाल में -
कुछ डूबे फिर उभर गए;
तो जी गए तुम!
क्या बंधन - क्या मोक्ष —
इस भूमंडल में ही परमधाम पा गए तुम!
तो, मन तो घबराएगा -
कुछ विचलित कर जाएगा,
हर हाल को स्वीकारना
जो व्याकुलता को स्वीकारा 
वहीं उसका संहार, और धैर्य का सृजन होगा -
इसी समता को अभ्यास से,
ध्यान से, योग से -
जो विकसित करोगे
तो जीवन का रहस्य - स्वयं 'जीवन' खोज लोगे।

Thursday, August 3, 2023

समझ

🤔

"अच्छा! अब समझी!"
यह कहकर मैंने ख़ुद को समझा दिया -
कि मैंने उसकी बात को समझ लिया -
क्या वाकई?
हो भी सकता है और नहीं भी
हर इंसान अपनी समझ के अनुसार ही दूसरे को समझ पाता है -
या अपनी नासमझी से नहीं या कुछ और समझ जाता है!

अब सवाल ज़हन में आया कि क्या हम ख़ुद को समझ पाते हैं?
तो इसका जवाब भी सिक्के के दो पहलू की तरह ही -
कुछ हद तक हाँ है,
और कुछ हद तक नहीं।

कुछ सही ग़लत नहीं होता -
सब अपनी समझ के अनुसार सही या ग़लत होते हैं।

तो जब धीरे - धीरे हमारी समझ का दायरा बढ़ता है,
तो हमारी सहनशीलता भी बढ़ती है -
और हम सबको - 
जो जैसा है, वैसे ही स्वीकार लेते हैं।

बस समझ - समझ की बात है
जो समझ गए, तो समझदार -
और जो ना समझे - वो भी कुछ तो समझे ही।
बस इतनी सी बात है!

Mumbai diaries

An ode marking my recent trips to Mumbai... Sitting in a chair in a locality where nothing changes At least nothing that meets t...